Toxic Review: यश का दमदार अवतार, शानदार एक्शन के बीच कहानी क्यों रह गई कमजोर?

मुंबई: यश की बड़े पर्दे पर वापसी और गीतू मोहनदास का अलग अंदाज ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता थी। 1940 के दशक की पृष्ठभूमि पर बनी यह एक्शन थ्रिलर गैंगस्टर ड्रामा, पारिवारिक भावनाओं, मनोवैज्ञानिक संघर्ष और भव्य दृश्यों को एक साथ पेश करने की कोशिश करती है। 194 मिनट लंबी फिल्म में कई ऐसे पल हैं जो बड़े पर्दे पर प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और जरूरत से ज्यादा कहानी के कारण फिल्म अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती।

कहानी में गैंगस्टर राया के इर्द-गिर्द बुनी गई है पूरी दुनिया
फिल्म की कहानी 1940 के दशक के गोवा के अपराध जगत के इर्द-गिर्द घूमती है। केंद्र में राया है, जिसका किरदार यश ने निभाया है। वह एक खतरनाक गैंगस्टर है, जिसकी जिंदगी हिंसा, महत्वाकांक्षा और उलझे रिश्तों से घिरी हुई है। उसकी बड़ी बहन गंगा, जिसका किरदार नयनतारा ने निभाया है, उसके जीवन में अहम स्थान रखती है। इसके अलावा नाडिया के रूप में कियारा आडवाणी, रेबेका के रूप में तारा सुतारिया, मेलिसा के रूप में रुक्मिणी वसंत और एलिजाबेथ के रूप में हुमा कुरैशी कहानी से जुड़ी हैं।

दूसरे किरदार में भी नजर आए यश
कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब ‘टिकट’ नाम का किरदार सामने आता है, जिसे भी यश ने ही निभाया है। फिल्म के दूसरे हिस्से में राया और टिकट के बीच संबंध और टकराव कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। राया को सिर्फ सत्ता और ताकत के पीछे भागने वाले गैंगस्टर के तौर पर नहीं दिखाया गया है, बल्कि उसके भावनात्मक फैसलों और आंतरिक विरोधाभासों को भी सामने लाने की कोशिश की गई है।

लेखन में विचार बहुत, लेकिन कहानी जरूरत से ज्यादा भरी हुई
गीतू मोहनदास ने पारंपरिक गैंगस्टर कहानी से अलग दुनिया बनाने की कोशिश की है। फिल्म में दमदार मुख्य किरदार, हिंसा, पृष्ठभूमि संगीत, भव्य प्रवेश दृश्य और एक्शन के बड़े हिस्से मौजूद हैं। राया की प्रस्तुति में यश की पिछली लोकप्रिय भूमिका की झलक महसूस हो सकती है, लेकिन यहां उसके चरित्र की कमजोरियों और जटिलताओं पर भी ध्यान दिया गया है।

फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसमें एक साथ बहुत कुछ कहने की कोशिश की गई है। 194 मिनट के लंबे समय के बावजूद कई महत्वपूर्ण भावनात्मक दृश्य जल्द खत्म हो जाते हैं। कुछ दृश्य केवल अगले बड़े एक्शन दृश्य तक कहानी पहुंचाने का जरिया लगते हैं। इसके उलट राया और टिकट के बीच के दृश्यों में मनोवैज्ञानिक तनाव फिल्म को ज्यादा प्रभावी बनाता है।

1940 के दशक का गोवा पर्दे पर दिखा भव्य अंदाज में
तकनीकी स्तर पर ‘टॉक्सिक’ काफी मजबूत है। 1940 के दशक के गोवा को पर्दे पर दोबारा रचने के लिए शानदार सेट, वेशभूषा और निर्माण कला का इस्तेमाल किया गया है। छायांकन फिल्म को अलग दृश्य पहचान देता है और छोटे से छोटे विवरण को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया गया है।

सर्कस वाला एक्शन सीक्वेंस बना खास आकर्षण
फिल्म के एक्शन दृश्यों में सर्कस की पृष्ठभूमि में नाडिया के आसपास फिल्माया गया हमला विशेष रूप से प्रभावशाली है। अलग माहौल और मंचीय अंदाज के कारण यह दृश्य सामान्य एक्शन से अलग दिखाई देता है। ध्वनि और संगीत भी यश के किरदार की पर्दे पर मौजूदगी को और प्रभावशाली बनाते हैं।

यश ने राया के किरदार में दिखाया अपना स्टारडम
चार साल बाद बड़े पर्दे पर लौटे यश फिल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा असर छोड़ते हैं। राया के रूप में उनका अंदाज सहज होने के साथ-साथ डर पैदा करने वाला भी है। वह ऐसा किरदार है जिसे आसानी से पसंद नहीं किया जा सकता और फिल्म भी उसे सीधे तौर पर आदर्श नायक बनाने की कोशिश नहीं करती।

दोहरी भूमिका में यश को अभिनय की अलग संभावनाएं मिलती हैं। राया और टिकट के बीच के दृश्य फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में शामिल हैं, जहां अभिनेता को दो अलग स्वभाव वाले किरदारों के बीच तनाव और अंतर को सामने लाना है।

महिला किरदार मजबूत, लेकिन पटकथा ने नहीं दिया पर्याप्त विस्तार
नयनतारा ने गंगा के किरदार में गंभीर और प्रभावशाली अभिनय किया है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनके किरदार को अपेक्षित विस्तार नहीं मिल पाता। कियारा आडवाणी नाडिया की भूमिका में अपनी छाप छोड़ती हैं, जबकि रुक्मिणी वसंत अपने दृश्यों में अलग ऊर्जा लाती हैं। हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया भी अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं।

हालांकि फिल्म में कई मजबूत महिला किरदार मौजूद हैं, लेकिन उनकी कहानियां राया की यात्रा के आगे सीमित हो जाती हैं। गंगा, नाडिया और एलिजाबेथ जैसे पात्रों को ज्यादा विस्तार दिया जाता तो कहानी और प्रभावी हो सकती थी।

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है पटकथा
‘टॉक्सिक’ में गैंगस्टर कहानी, पारिवारिक संघर्ष, प्रेम, बदला और मनोवैज्ञानिक तनाव को एक साथ रखा गया है। समस्या यह है कि इन सभी हिस्सों के बीच बदलाव हमेशा सहज नहीं लगता। कई बार कहानी की गति और उसका भाव लगातार बदलता हुआ महसूस होता है।

194 मिनट की लंबाई भी कुछ हिस्सों में खलने लगती है। फिल्म की भव्यता और तकनीकी खूबियां मजबूत हैं, लेकिन बेहतर संपादन और ज्यादा कसी हुई पटकथा इसे कहीं अधिक प्रभावशाली बना सकती थी।

फैसला: भव्यता और यश के लिए देख सकते हैं फिल्म
‘टॉक्सिक’ पूरी तरह निराश करने वाली फिल्म नहीं है। इसकी तकनीकी गुणवत्ता, शानदार दृश्य, कल्पनाशील एक्शन और यश की दमदार स्क्रीन मौजूदगी इसे देखने लायक बनाती है। गीतू मोहनदास ने सामान्य गैंगस्टर फिल्मों से अलग कुछ करने का प्रयास किया है, लेकिन कहानी को ज्यादा कसावट और भावनात्मक दृश्यों को अधिक समय की जरूरत थी।

कुल मिलाकर ‘टॉक्सिक’ की सबसे बड़ी ताकत इसका विजुअल वैभव और यश का अभिनय है, जबकि कमजोर पटकथा इसकी राह में सबसे बड़ी रुकावट बनती है। फिल्म को 5 में से 3 स्टार दिए जा सकते हैं।

 

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